तुम्हारे प्रेम का अनुरागी मन

तुम्हारे प्रेम का अनुरागी मन

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तुम असिमित विस्तार हो मेरे स्वप्नों का,
अधूरी आकांक्षाएं लिये मेरे बोझिल नैन,
किसी निशब्द रात्रि के साथ,
तुम्हारे स्वप्नों के प्रांगण में उतरकर,
कोई पूर्ण होते ख्वाब को देखकर ठहर गये हो !!

श्वेत चाँदनी सी जो तुम्हारी पैरों की नूपुर,
मेरे मन के आँगन में एक मधुर स्वर की झंकार करते,
मेरे प्रेम को पल्लवित करती,
और मैं अलसायी आँखों को मूंदकर,
अपने अनकहे शब्दों को अधरों में समेट लेता !!

तुम्हारे प्रेम का अनुरागी मन,
चंचलायमान होकर भी कितना स्थिर है,
स्थिरता तुम्हारी कितनी प्रवाहपूर्ण है,
और मुझमें वेग होकर भी कितना तटस्थ हूँ मैं,
प्रेम का प्रवाह कितना स्थितप्रज्ञ है,
जो बह रहा है किन्तु स्थिर है !!
~श्वेता पाण्डेय

Tumhare Prem Ka Anuragi Man

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Tum Aseemit Vistaar Ho Mere Swapno Ka,
Adhoori Akankshaye Liye Mere Bojhil Nain,
Kisi Nishabd Ratri Ke Saath,
Tumhare Swapno Ke Pragan Mein Utarkar,
Koi Poorn Hote Khwab Ko Dekhkar Thehr Gaye Ho !!

Shwet Chandni Si Jo Tumhari Peiro Ki Nupur,
Mere Mann Ke Aangan Mein Ek Madhur Swar Ki Jhankar Karte,
Mere Prem Ko Pallvit Karti,
Aur Main Alsayi Ankhon Ko Moondkar,
Apne Ankahe Shabdo Ko Aadhro Mein Samet Leta !!

Tumhare Prem Ka Anuragi Man,
Chanchlayman Hokar Bhi Kitna Isthir Hai,
Isthirta Tumhari Kitni Pravahpoorn Hai,
Aur Mujhme Veg Hokar Bhi Tatsth Hu Main,
Prem Ka Pravah Kitna Isthitpragya Hai,
Jo Beh Raha Hai Kitnu Isthir Hai !!
~Shweta Pandey

Shweta Pandey
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